Tuesday, May 11, 2010

छल

बहुत दिनों तक...
बहुत छला तुमने..
बात हुई ख़त्म अब

सच बोलूँ तो
यह सब मुझे था मालूम
हमेशा से...
पर मुझे बिल्कुल नहीं
तुमसे गिले-शिकवे

शुक्रिया तुम्हारा..
था धोखा ही सही
पर तुम कुछ दिन..
मेरे तो हुए.

6 टिप्पणियाँ:

दिलीप said...

waak prem ki parakashtha dikha di aapne to

दिलीप said...
This comment has been removed by the author.
Udan Tashtari said...

बहुत सुन्दर!

अंतर्मन | Inner Voice said...

दिलीप और समीर जी, हमारे शब्द आपको पसंद आए, जानकार प्रसन्नता हुई!

संजय भास्कर said...

हमेशा की तरह उम्दा रचना..बधाई.

manish kumar patel said...

shayad yahi samarpan ki paribhasha hai................