Saturday, May 08, 2010

हदें

तुमने फिर से
वही किया
फिर से वही झूठ
फिर वही वादा
फिर वही मुआफ़ी
फिर वही रंजिश
फिर वही जुनून

कितनी बार मैं
करूँगा इंतज़ार तेरा
कितनी बार होऊंगा रुसवा
कितनी बार तुम
करोगे मुझे उदास

मालूम है तुम्हें
दर्द की भी
होती है हदें

गर नहीं हैं हदें तो..
तेरी वादाखिलाफी की.

4 टिप्पणियाँ:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

वाह भई बहुत सुंदर.

अंतर्मन | Inner Voice said...

धन्यवाद काजल जी!

संजय भास्कर said...

बहुत सुंदर और उत्तम भाव लिए हुए.... खूबसूरत रचना......

Sanjay kumar
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

manish kumar patel said...

jindgi kabhi kabhi aise hi mod per lakar khada kar deti hai.......