Saturday, January 09, 2010

शेर

बहुत पहले कभी पढ़ा था :

दोस्ती हो किसी से या अदावत

मज़ा दे जाएगी जो दिल से होगी!

Sunday, December 27, 2009

ग़ज़ल

फर्क क्या पड़ता है तुम आओगे के न आओगे
ये तेरा नाम फिज़ाओं में लिखा रक्खा है

है ये मुमकिन नहीं यादों को तेरी मिट जाना
तेरे उन ख़तो को किताबों में छुपा रक्खा है

है ये आसाँ नहीं इस जहाँ में तेरा गुम होना
वो तेरा नाम हवाओं को बता रक्खा है

कैसे गुस्ताख गुलों पर मैं भरोसा कर लूँ
मेरे इस चमन को कांटों ने बचा रक्खा है

Thursday, September 03, 2009

Mika Tamil Bhangra Quick Gun Murgan

Saturday, August 29, 2009

बंगलोर -5वाँ दिन

अभी कार नहीं होने की वजह से बहुत समस्या है|
कल सुबह मैं नाश्ते का सामान लेने चला तो बच्चों ने भी साथ चलने की ज़िद कर दी| 1 किलोमीटर की यात्रा में समझ नहीं आ रहा था कि आगे चलें या लौट जाएँ| रास्ते भर बच्चे 'डिज़्गस्टिंग' , 'दिस ईज़ वीर्ड' बोलते रहे| बच्चे 'डॅडी वाइ डोंट दे हैव साइड्वॉक' जैसे प्रश्न पूछते रहे जिसमें से किसी का उत्तर मेरे पास नहीं था| एक पढ़े-लिखे से दिखने वाले महानुभाव ने अपनी कार तो करीब करीब हमारे ऊपर ही रोक दी| इतना समझ में आ गया की पैदल चलने की कोशिश करना बहुत ख़तरनाक है|

दोपहर को शॉपिंग के लिए जाने का मन हुआ तो एक टैक्सी बुलाई| टैक्सी बुकिंग इतनी 'हाई टेक' है की क्या बताएँ| बुकिंग डीटेल्स और कैब डीटेल्स एस एम एस पर भेज दिए जाते हैं| वैसे यहाँ की टैक्सी भारत में सबसे महँगी सेवा है|
जेट लैग की वजह से हम लगभग हर दिन शाम को ज़ल्दी सो जाते हैं| आज शाम को बिजली भी नहीं थी तो सब ज़ल्दी ही सो गए| रात को भौंकते कुत्तों की आवाज़ों ने ज़ल्दी जगा दिया|