Monday, August 22, 2005

संभव है क्या?

मैने यहाँ एक कविता की पहली कुछ पंक्तियाँ दी है...इसे आगे बढ़ाने का प्रयास कीजिये-

इस एकाकी जीवन के तुम,
उल्लास बनो- संभव है क्या?

पतझड़ में सूखा बिरवा मैं,
मधुमास बनो- संभव है क्या?

मैं उड़ना चाहूं, तुम मेरे,
आकाश बनो- संभव है क्या?

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1 comment:

Jitendra Chaudhary said...

लो अब आगे की मुझसे झेलो


मै लिखू ब्लाग अपना
तुम पाठक बनों ‍- सम्भव है क्या?

हर रोज मै लिखूँ, जो मेरा मन कहे
तुम करो टिप्पणी प्रतिदिन - सम्भव है क्या?