Sunday, July 17, 2005

याद तुम्हारी

याद आती है तुम्हारी।
अब नहीं बर्दाश्त होता..
समय बहता जा रहा है,
जागता हूं न सोता।

रात दिन करवट बदलते,
मुझसे फिर भी कुछ न कहते..
दूर तुमसे हो गया हूं,
मेरी पीडा कौन समझे।

कब वो दिन आएगा कि जब,
तुम हमारे साथ होगे..
विरह की बदरी छटेगी,
मेरी बांहों में रहोगे।

2 comments:

संजय विद्रोही ( Dr. Sanjay Sharma) said...

धरणीधर जी,

कविता अच्छी है आपकी... बधाई.
हिन्दी बडी प्यारी भाषा है, मन की बात सहज ही कह देती है...
आपके ऒर मेरे ब्लाग में एक समानता है..देखें pratimanjali.blogspot.com

स्नेह की कामना में-
संजय विद्रोही

Tarun said...

to bhaiya utar hi gaye maidan me.....thore dino ki baad hai phir koi dusri hi kavita gaane lagoge.
Swagat hai.